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गरीबों की बुलंद आवाज चौधरी देवीलाल भाषण कहानी प्रस्ताव



भारतीय राजनीति के इतिहास का अगर हम अवलोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि बहुत से ऐसे नेता हुए जिन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत शोषित वर्ग की लड़ाई से की मगर जैसे-जैसे उनका कद राजनीति में बढ़ता गया वैसे ही वह शोषित वर्ग से दूर होते गए मगर चौधरी देवीलाल ऐसे नेता के रूप में दिखाई पड़ते हैं जो चाहे सत्ता के किसी भी पद पर रहे हो मगर वह शोषित वर्ग से दूर नहीं हुए उन्होंने कभी भी सत्ता प्राप्ति के लिए गरीबों के हक से दूरी नहीं बनाई इसलिए चौधरी देवीलाल को पंजाब, हरियाणा, राजस्थान की जनता पंजाब केसरी, हरियाणा केसरी किसान नेता इत्यादि कई प्रकार के विशेषणों से संबोधित करती रही है चौधरी देवीलाल में गरीबों व शोषित वर्ग के लिए प्यार बचपन से ही था वह इस वर्ग के उत्थान के लिए बचपन से ही संघर्ष करने के लिए उत्साहित रहते थे एक बार जब उनके पिता ने उन्हें फसल के बंटवारे के लिए खेत में भेजा तो उन्होंने खेत में काम करने वाले वाले मजदूरों को 5 मण से अधिक गेहूं दे दिया था जब चौधरी साहब अपनी यौन अवस्था में आए तो उन्होंने अपने बड़े भाई चौधरी साहब राम के साथ मिलकर जमीदारों के विरुद्ध मजदूरों को एकत्र करके एक आंदोलन चलाया था ताकि जमीदार अपने खेतों में काम कर रहे मजदूरों का शोषण ना कर सके 1932 के बाद देवीलाल अपने इलाके के बड़े-बड़े जमीदारों के विरुद्ध किसानों का आंदोलन खड़ा करने में रुचि लेने लगे बड़े-बड़े जमीदार अपने खेतों में काम करने वाले भूमिहीन किसानों को खेतों में से निकाल देते थे ऐसे किसान उनकी सहायता से अपनी खोई हुई भूमि प्राप्त करने में सफल रहते थे चौधरी देवीलाल साहब आजादी के बाद हुए अपने चुनाव में सन 1952 में संयुक्त पंजाब के विधानसभा जीतकर पहुंचे थे उन्होंने इस समय कांग्रेस में रहते हुए भी कई बार कांग्रेस के विरुद्ध जाकर किसानों की मांग को उठाया था जिससे उस समय के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों से उनकी दूरियां बढ़ने लगी चौधरी साहब को अपनी बातों का यह परिणाम भुगतना पड़ा कि सन 1951 के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया था मगर चौधरी देवीलाल इतना सब हो जाने के बाद भी उन्होंने कभी इस बात की चिंता नहीं कि इस कारण उनके राजनीतिक जीवन को नुकसान पहुंच सकता है जब उन्होंने उन्हें लगा कि कांग्रेस सरकार गरीबों में किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही है तो उन्होंने संयुक्त 1962 में निर्दलीय चुनाव लड़ा और एक बार फिर पंजाब विधानसभा में उनके स्वर और अधिक प्रचार प्रखर होकर गूंजे उन्होंने विधानसभा को एक ओपन यूनिवर्सिटी में बदल दिया था और जब भी चौधरी देवीलाल विधानसभा में कुछ बोलने के लिए खड़े होते थे ऐसा लगता था कि जैसे कई गरीब वंचित वर्ग का जीता-जागता स्वरूप दिखाई दे रहा हो जब उन्हें महसूस होने लगा कि पंजाब के लोग गैर पंजाबी क्षेत्र के साथ अन्याय कर रहे हैं तो उन्होंने पंजाब से पृथक अलग राज्य की मांग की मगर कुछ लोगों ने अपनी इस मांग के विरुद्ध प्रचार करने लगे और कहने लगे कि चौधरी साहब अलग राज्य चाहते हैं ताकि वह उसके मुख्यमंत्री बन सके जब चौधरी साहब को यह बात पता चली तो उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वह हरियाणा का पहला चुनाव नहीं लड़ेंगे चौधरी साहब के अथक प्रयासों से ही 1 नवंबर 1966 को हरियाणा का एक अलग वह पृथक राज्य के रूप में उभर कर आया चौधरी साहब ने भले ही पहला चुनाव लड़ा हो मगर उन्होंने अपने अंदर ही गरीबों के संघर्ष की आग बुझने नहीं दी चौधरी साहब अपने कार्यों के कारण हरियाणा के जनमानस की आवाज बन गए थे वे हर वर्ग की आवाज बन गए थे जब भी किसी के साथ अन्याय होता चौधरी साहब उनकी मदद करते थे इसी दौरान देश में जेपी आंदोलन चल रहा था तब चौधरी साहब बीजेपी का साथ देने लगे इसलिए इमरजेंसी के कारण इंदिरा जी ने उन्हें 19 महीने के लिए जेल में रख दिया था इतने लंबे संघर्ष के बाद हरियाणा के हिस्से में वह दिन आया जब चौधरी साहब 12 जून 1977 को हरियाणा के मुख्यमंत्री बने चौधरी साहब के लिए राजनीति का अर्थ सत्ता नहीं था बल्कि उनकी राजनीति का अर्थ व उद्देश्य गरीब किसान वंचित वर्ग को उसका हक दिलाना था इसलिए हम कह सकते हैं चौधरी साहब ही सच्चे अर्थों में गरीबों के बुलंद आवाज थे सुंदर डॉ राजाराम चौटाला से चंडीगढ़ पृष्ठ नंबर 1 लाइट एंड लाइफ पब्लिशर डॉ राजाराम चौटाला से चंडीगढ़

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